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keshav
जहां में सबको देख-देख कर,
मैं भी सीख गया बात बनाना,
रिश्ते-रास्तों की समानता देख,
मैं भी सीख गया रिश्ते निभाना।
आंखों के काजल को चुराकर,
मैं भी सीख गया आँख चुराना,
अपने को ही बेगाना बनाकर,
सीखा गैरों को अपना बनाना।
सभी मालिक!मैं हूँ एक गुलाम,
अपने आदरणीय मालिकों का,
पा के इशारा!बना जिम्मेदाराना,
उन्हीं लोगों के इशारों पर अब,
मैं सच्चाई पर शब्द कम्बल डाल,
सीख गया हर करतूत को छिपाना।
दिल एक दर्पण है!सच कहता है,
मैं सीख गया उसको भी  दबाना।
अपनी स्वयं की परछाई को भी,
अब सीख गया!गैरों का बताना।
सभी बहुत चतुर हैं इस जहां में,
इन्ही बहुत चतुर और चालाक!
सियासतदानों के खेल को देख,
सीखा धोखा देना-हाथ मिलाना।
मुझे नेता!जरूरी हुआ है बनाना,
क्योंकि अब मैं भी अच्छी तरह से,
सीख गया हूँ!वादे करके भुलाना,
और सीख गया खुद को ही ठगना।
मैं अब सीख गया ताल मिलना भी,
सभी अब सीख गये मुझे भी नचाना।
अपने सभ्य समाज में इस तरह!
व्याप्त वर्तमान कुव्यवस्था देखकर,
मजबूर होकर पड़ा मुझको ये लिखना

         #केशव कुमार मिश्रा

परिचय: युवा कवि केशव के रुप में केशव कुमार मिश्रा बिहार के सिंगिया गोठ(जिला मधुबनी)में रहते हैं। आपका दरभंगा में अस्थाई निवास है। आप पेशे से अधिवक्ता हैं।

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