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घर छोड़ आई बाबुल का,जो गैरों के वास्ते।
मन से जिसने अपनाया,पिया के सब रास्ते।।
अज़नबी थे उनसे सब,नाते जोड़ रही है।
अपनों का संग प्यारी,बिटिया छोड़ रही है।।

नया घर नयी माँ,देवर,ननद,ससुर रूप में बापू को पाया।
क्या हम सबने उसे भी, बेटी सा अपनाया।
वो नन्ही चिड़िया,पुराना घरोंदा तोड़ रही है।
अपनों का संग प्यारी,बिटिया छोड़ रही है।।

अजनबियों के घर जाकर,क्या तुम कभी रह पाओगे।
अंजाने रिश्तों को एकदम,कैसे तुम अपनाओगे।
धीरे धीरे पीहर से वो,अपना मुख मोड़ रही है।
अपनों का संग प्यारी,बिटिया छोड़ रही है।।

बहु को बेटी समझो,वह तुम्हारी हो जायेगी।
अंत समय तक बिटिया बनकर,अपना फ़र्ज़ निभायेगी।
दहेज़ी हत्यारों की क्या?,आत्मा नहीं झंझोड़ रही है।
अपनों का संग प्यारी,बिटिया छोड़ रही है।।

#उपद्रवी
शशांक दुबे
छिंदवाड़ा

लेखक परिचय : शशांक दुबे पेशे से सहायक अभियंता (प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना), छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश में पदस्थ है| साथ ही विगत वर्षों से कविता लेखन में भी सक्रिय है |

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