प्रेम लता बहन जिन्होंने साधु महात्माओ को दिया ईश्वरीय ज्ञान

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gopal narsan

प्रजापिता ब्रह्मा बाबा की पालना लेकर ब्रह्माकुमारीज् संस्था प्रमुख प्रकाशमणि दादी व दादी जानकी के सानिदय में रही प्रेम लता बहन ईश्वरीय ज्ञान की दिव्य
विभूति थी।तभी तो जो भी उनसे मिलता प्रभावित हुए बिना नही रहता।यहां तक
कि उनके मार्गदर्शन के कारण कइयो के जीवन की दिशा ही बदल गई।कुछ ईश्वरीय ज्ञान यज्ञ का हिस्सा बन
गए तो कुछ जो व्यसनों के आदी थे,से सदा के लिए मुक्ति पा गए।हमेशा चेहरे
दूसरे की मुस्कुराहट लिए शांत भाव की मालकिन प्रेम बहन बचपन के समय ही
ब्रहमाकुमारीज संस्था से जुड़ गई थी। 18 जनवरी 1940 में जन्मी प्रेम लता बहन
को 1952 में ईश्वरीय ज्ञान मिला और 1956 में वे इस ज्ञान के सागर में जीवनभर
के लिए समर्पित ही गई। प्रेमलता के अंदर ब्रहमाकुमारी संस्था के संस्थापक
ब्रहमा बाबा ने ईश्वर के प्रति मधुर मिलन की ललक देखी, तो
उन्होंने उन्हें अपने सानिध्य में ले लिया। ब्रहमा बाबा चाहते थे, कि
परमात्मा शिव का ईष्वरीय ज्ञान भक्ति मार्ग के साधु संतों को भी मिले।
जिसके लिए उन्होंने ब्रहमाकुमारी प्रेमलता बहन को इस ईश्वरीय सेवा के लिए
निमित्त बनाया और उन्हें हरिद्वार में जाकर साधू संतों को ईष्वरीय ज्ञान बांटने की सेवा दी। सचमुच बहुत कठिन परीक्षा थी ब्रहमाकुमारी प्रेमलता के
लिए, क्योंकि जिन साधू संतों को ईष्वरीय ज्ञान देने की जिम्मेदारी उन्हें
सौंपी गई, वें साधू संत तो स्वयं को सर्वज्ञानी मानते हैं। फिर भला वें एक बालिका से कैसे ज्ञानार्जन करना स्वीकार कर सकते थे। लेकिन प्रेमलता
के लिए ब्रहमा बाबा का आदेष ही सर्वोपरि रहा, चाहे उसमें कितनी भी कठिनाई
ही क्यों न हों। वें हरिद्वार आई और उन्होंने हरिद्वार के आश्रमों में
जाकर साधू संतों से सम्पर्क साधना आरम्भ किया। आरम्भ में साधू संत उनसे
मिलना भी गंवारा नहीं समझते थे और यदि मिल भी जाते तो प्रेमलता को छोटी
बच्ची समझ स्वयं ही भक्ति मार्ग का ज्ञान उन्हें देने लगते। लेकिन साधू
संतों की बातों को सुन मंद मंद मुस्काती प्रेमलता के चेहरे पर कभी शिकन
तक नहीं आई और जब साधू संतों की बात समाप्त हो जाती या फिर यदि वें क्रोध
में होते तो उनका क्रोध षांत हो जाता, तब बड़े ही सहज भाव से प्रेमलता
ईष्वरीय ज्ञान का उन्हें ऐसा पाठ पढ़ाती, कि साधू संत उनके सामने
पानी-पानी हो जाते। प्रजापिता ब्रहमाकुमारी ईष्वरीय विष्व विद्यालय के
धर्म सेवा प्रभाग की राश्ट्रीय समनव्यक एवं पंजाब जोन सब प्रभारी
प्रेमलता मुझे जब भी अपने सेवा केन्द्र देहरादून या फिर हरिद्वार रुड़की
आगमन पर मिलती तो लगता जैसे वें मेरे ऊपर स्नेह वर्षा कर रही हैं।
देहरादून में जब भी उन्हें मेरे आने की खबर मिलती तो वें मुझसे मिलने के
लिए दौड़ी चली आती और मुझे परमात्म ज्ञान के साथ-साथ सदाचार जीवन का पाठ
विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से पढ़ाती। हमेंशा पूछती गोपाल भाई कुछ खाया
या नहीं और रुड़की आश्रम के अन्य भाई बहनों के बारे में भी कुशलक्षेम जरूर
पूछती। एक बार प्रेमलता बहन जी ने एक किस्सा सुनाया, बोली भाई एक दिन
हमारे आश्रम में एक वृद्ध दम्पत्ति आए और बोले बहन जी घर में धन सम्पत्ति
आभूशण आदि बहुत है और हमें डर लगता है कि कोई हमारी हत्या न कर दे। जिस
कारण हमें रात को नींद भी नहीं आती और दिन भी तनाव के साथ ही बीतता है,
कोई उपाय बताईये, मैंने कहा कि बस इतनी सी बात ऐसा करो घर में जितना भी
रुपया पैसा और आभूशण है उन्हें एक पोटली में बांधकर किसी नदी या नहर में
डाल आओ, आपकी सारी चिन्ताऐं और डर समाप्त हो जाएगा। दम्पत्ति बोले बहन जी
यह आप क्या कह रही हो, हम ऐसा कैसे कर सकते हैं। वो धन-सम्पदा तो हमारी
अपनी है। हम उसे नदी या नहर में कैसे डाल सकते हैं। लेकिन जब बहन जी ने
उन्हें कहा कि यह धन-सम्पदा के प्रति बेवजह का मोह ने ही आपके चैन को हर
लिया है। इससे मोह छोड़ दोगे तो जीवन खुशियों भरा हो जाएगा। वहीं एक बार
उनके आश्रम में एक चोर घुस आया, लेकिन जब बहन जी ने उसे प्यार से बुलाकर
पूछा भाई क्या काम हे कोई तकलीफ तो नहीं तो वह बिना चोरी किए माफी मांगकर
चला गया। प्रेमलता का खुशनुमा चेहरा, मीठी वाणी, षांत स्वभाव और हर वक्त
ईष्वरीय याद में रहना उनके जीवन के आभूशण रहे हैं। एक बार प्रेमलता ट्रेन
में उनकी तबियत बिगड़ गई जिसपर उन्हें रुड़की में ट्रेन से उतारकर
प्राथमिक उपचार के बाद देहरादून ले जाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया।
लेकिन वहां जब उन्हें होश आया तो वें एक मिनट भी अस्पताल में नही रुकी और
चिकित्सकों को यह कहकर कि वें अब पूरी तरह से ठीक हैं अपने आश्रम आ गई।
सचमुच जीवटता की धनी रही हैं प्रेमलता बहन जी। 11 जुलाई 2017 की शाम
8 बजे कुछ शारीरिक रूग्णता के चलते उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया था और
ईष्वरीय गोद ले ली थी।उनका अचानक चले जाना सभी को हतपरभ कर गया लेकिन लगता
है उन्होने पहले ही परमधाम चलने की तैयारी कर ली थी।बहुत कम
बोलना,ईश्वरीय याद में रहना और स्वयम को इस संसारिक दुनिया से पूरी तरह
विरक्त कर लेना उनकी विरक्ति के संकेत थे।उनके जाने के बाद उनकी यादे
हमे सन्मार्ग दिखाएगी और हम परमात्म ज्ञान पर निरन्तर चल सकेंगे,ऐसा
विश्वास है।उनकी याद में एक स्मरणिका भी आई है जिसमे उनकी स्मृतियों को शब्दों में पिरोया गया है।

#श्रीगोपाल नारसन
परिचय: गोपाल नारसन की जन्मतिथि-२८ मई १९६४ हैl आपका निवास जनपद हरिद्वार(उत्तराखंड राज्य) स्थित गणेशपुर रुड़की के गीतांजलि विहार में हैl आपने कला व विधि में स्नातक के साथ ही पत्रकारिता की शिक्षा भी ली है,तो डिप्लोमा,विद्या वाचस्पति मानद सहित विद्यासागर मानद भी हासिल है। वकालत आपका व्यवसाय है और राज्य उपभोक्ता आयोग से जुड़े हुए हैंl लेखन के चलते आपकी हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकें १२-नया विकास,चैक पोस्ट, मीडिया को फांसी दो,प्रवास और तिनका-तिनका संघर्ष आदि हैंl कुछ किताबें प्रकाशन की प्रक्रिया में हैंl सेवाकार्य में ख़ास तौर से उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए २५ वर्ष से उपभोक्ता जागरूकता अभियान जारी है,जिसके तहत विभिन्न शिक्षण संस्थाओं व विधिक सेवा प्राधिकरण के शिविरों में निःशुल्क रूप से उपभोक्ता कानून की जानकारी देते हैंl आपने चरित्र निर्माण शिविरों का वर्षों तक संचालन किया है तो,पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों व अंधविश्वास के विरूद्ध लेखन के साथ-साथ साक्षरता,शिक्षा व समग्र विकास का चिंतन लेखन भी जारी हैl राज्य स्तर पर मास्टर खिलाड़ी के रुप में पैदल चाल में २००३ में स्वर्ण पदक विजेता,दौड़ में कांस्य पदक तथा नेशनल मास्टर एथलीट चैम्पियनशिप सहित नेशनल स्वीमिंग चैम्पियनशिप में भी भागीदारी रही है। श्री नारसन को सम्मान के रूप में राष्ट्रीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा डॉ.आम्बेडकर नेशनल फैलोशिप,प्रेरक व्यक्तित्व सम्मान के साथ भी विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ भागलपुर(बिहार) द्वारा भारत गौरव
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।