नेतृत्व के आवश्यक गुण

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krishn

जी हाँ मित्रों!
नेतृत्व करना एक ख़ास कला है ,जो सामान्य व्यक्तित्व के अन्दर नहीं होती। श्रेष्ठतम लीडर वही बन पाता है ,जो लोगों के दिलों पर राज करता है  और जिसकी personality को हर कोई स्वीकारता है। ऐसे व्यक्ति के साथ काम करने वाले लोग अपना सब कुछ उस पर निछावर करने के लिए तत्पर होते हैं ।

 नेतृत्व कुशलता एक ऐसी कला है ,जिसके माध्यम से बहुत आसानी से बड़े-बड़े असंभव कार्यों को भी सरलता के साथ किया जा सकता है !  बिना मार्गदर्शन के आगे बढ़ने में भटकाव ही होता है ! और किसी भी तरह की सफलता प्राप्त नहीं होती है ! बिना नेतृत्व के इकठ्ठा हुयी भीड़ से कुछ ख़ास कार्य नहीं कराया जा सकता , वहीं सही नेतृत्व से सेना की एक छोटी सी टुकड़ी के द्वारा भी युद्ध जीता जा सकता है !

आइये जानते हैं उन गुणों को ,जो नेतृत्व के लिए आवश्यक हैं —-

*1.अनुशासन प्रिय होना* —- एक नेतृत्व कर्ता को स्वयं अनुशासित जीवन जीना चाहिए  और समय पर हर काम को पूरा करना चाहिए । ऐसा होने पर ही उसके Subordinate और colleague अनुशासित रहेंगे और अपने निर्धारित कार्यों को समय पर पूरा करने का प्रयास करेंगे !

*2.श्रमशीलता* — जो व्यक्ति श्रम को ही पूजा मानते हैं तथा अपेक्षा से अधिक काम करने की चाहत व क्षमता रखते हैं ,वे ही अपने सहकर्मियों को और अधिक अच्छा करने की प्रेरणा दे सकते  हैं ।

*3.उत्तरदायी होना* —व्यक्ति को अपने कार्यों के प्रति जिम्मेदार या उत्तरदायी होने के साथ -साथ अपने अंतर्गत काम करने वालों की गलतियों व असफलताओं के दायित्व को स्वीकार करने का साहस भी होना चाहिए। ऐसा किये बिना उनके विश्वास को नहीं जीता जा सकता ।

*4.वस्तुनिष्ठ व्यवहार* —सफल नेतृत्व कर्ता के व्यवहार में निष्पक्षता एवं सोच में वस्तुनिष्ठता का गुण होना चाहिए !  इसके लिए Personal relationships को professional relationships से बिलकुल अलग रखा जाना चाहिए।

*5.साहस* – नेतृत्वकर्ता को साहस का परिचय देते हुए चुनौतियों को स्वीकार करना चाहिए और अपना पुरुषार्थ करना चाहिए।  जो व्यक्ति आत्मविश्वास से भरपूर और निर्भय नहीं होते हैं ,उनके नेतृत्व को बार-बार चुनोतियाँ मिलती रहती हैं और ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व को उसके सहकर्मी लम्बे समय तक स्वीकार नहीं कर पाते।

*6.स्वनियंत्रण* – नेतृत्व कर्ता को अपनी वाणी एवं व्यवहार नियंत्रण में रखना आना चाहिए, क्योंकि  नेतृत्व कर्ता के मर्यादाहीन व्यवहार से उसके नियंत्रण में काम करने वाले लोग भी मनमानी करने लगते हैं।

*7.सही निर्णय लेने की क्षमता* – जो व्यक्ति अपने निर्णयों को बार-बार बदलता है , उसकी निष्पक्षता और बुद्धिमत्ता संदिग्ध रहती है। इसीलिए नेतृत्व कर्ता को ठीक से सोच विचार कर दूरदर्शिता के साथ सही  निर्णय लेना आना चाहिए।

*8.स्पष्ट योजना* —एक सफल नेतृत्व कर्ता केवल अनुमान के आधार पर कोई कार्य नहीं कर सकता। उसे कार्य की योजना बनाना और योजनानुसार कार्य करना आना चाहिए।

*9.सहानुभूतिपूर्ण सोच* – एक नेतृत्व कर्ता को सकारात्मक और सहानुभूतिपूर्ण सोच वाला होना चाहिए। साथ वालों का बुरा न हो और  यथा संभव भला हो ,ऐसे व्यवहार से ही दूसरों का दिल जीता जा सकता है।

*10.शालीन व्यवहार* – कहते हैं ,व्यक्ति वाणी से ही दोस्त और दुश्मन बनाता है।
वाणी में मिठास और व्यवहार में शालीनता व्यक्ति को समूह में स्वीकृति दिलवाती हैं ,जो नेतृत्व की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

*11.सहकारिता की प्रवृति* – नेतृत्व कर्ता अपने हर काम को सहकार अर्थात एक सबके लिए ,सब एक के लिए  की भावना से करता है, वो अपने समूह की सफलता में ही अपनी सफलता देखता है।

*12.अहम् से दूरी* —नेतृत्व कर्ता में अपनी कमजोरियों या गुणों के सम्बन्ध में किसी प्रकार की ग्रंथि नहीं होनी चाहिए ,उसे अपने अहम् को दूर रख यथार्थ को स्वीकार करने का साहस दिखाना चाहिए।

*13.संस्थान के लिए समर्पण भावना*  जॉनजो अधिकारी अपने संस्थान के हितों के प्रति समर्पित नहीं होता ,  उसे अपने अधीनस्थों से भी ऐसी आशा नहीं रखनी चाहिए।

*14.जानकारी की पूर्णता* – नेतृत्व कर्ता को अपने संस्थान के प्रत्येक कार्य की थोड़ी या अधिक जानकारी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। इसके अभाव में उसको सहायकों द्वारा मुर्ख बनाये जाने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं !

*15.संपर्कों से सुद्रढ़ता* – नेतृत्व कर्ता का व्यावसायिक और गैर व्यावसायिक क्षेत्रों से भी संपर्क होना चाहिए और उनकी जरुरत के समय यथा संभव सहयोग भी करना चाहिए। इससे उसे भी अन्य लोगों का सहयोग मिलेगा ।

*16.अनोपचारिक सम्बन्ध* – नेतृत्व कर्ता को अपने सम्बन्ध को प्रगाढ़ करने के लिए अपने साथियों की खुशियों में उत्सव मनाने और विपत्ति के समय सहानुभूति व्यक्त करने से संबंधों में प्रगाढ़ता बढती है।

*17.अविचल साहस* – यह साहस स्वयं के ज्ञान और अपने व्यवसाय के ज्ञान पर आधारित होता है। कोई भी अनुयायी नहीं चाहता कि उसके लीडर में आत्मविश्वास और साहस का अभाव हो। कोई भी बुद्धिमान अनुयायी ऐसे लीडर को लंबे समय तक नहीं झेल पाता।

*18.सहयोग* – सफल लीडर को मिलकर प्रयास करने के सिद्धांत को समझ लेना चाहिए और उस पर अमल करना चाहिए और अपने अनुयाइयों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

*19.न्यायपूर्ण आचरण* – न्यायपूर्ण आचरण के बिना कोई लीडर अपने अनुयाइयों का सम्मान न तो हासिल कर सकता है, न ही उसे लंबे समय तक बनाए रख सकता है।

*20.निर्णय की निश्चितता* – जो आदमी ढुलमुल निर्णय लेता है वह बताता है कि उसे खुद पर विश्वास नहीं है और ऐसा आदमी दूसरों का सफलतापूर्वक नेतृत्व नहीं कर सकता।

*21.योजनाओं की निश्चितता* – सफल लीडर अपने काम की योजना बनाता है और योजना पर काम करता है। जो लीडर व्यावहारिक और निश्चित योजनाओं के बिना केवल अंदाजे से काम करता है वह उस जहाज की तरह होता है जिसमें रडार न हो, देर-सबेर वह चट्टानों से टकराकर नष्ट हो जाएगा।
*22.जितना मिले,उससे ज्यादा देने की आदत* –  लीडरशिप की सजाओं में से एक यह है कि लीडर अपने अनुयाइयों से जितने की आशा करता है उसे स्वेच्छा से उससे अधिक देने के लिए तैयार रहना चाहिए।

*23.सुखद व्यक्तित्व* – कोई भी बेतरतीब या लापरवाह आदमी सफल लीडर नहीं बन सकता। लीडरशिप के लिए सम्मान चाहिए। अनुयायी ऐसे लीडर का सम्मान नहीं करेंगे जिसे सुखद व्यक्तित्व के सभी तत्वों में अच्छे अंक न मिलें।

*24.सहानुभूति और समझ* – सफल लीडर को अपने समर्थकों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। यही नहीं, उसे उन्हें और उनकी समस्याओं को भी समझना चाहिए।

*25.विवरण की कुशलता* – सफल लीडरशिप के लिए यह भी जरूरी है कि वह लीडर की स्थिति के विवरण में भी पारंगत हो।

*26.पूरी जिम्मेदारी लेने की इच्छा* –  सफल लीडर को अपने समर्थकों की गलतियों और कमियों की पूरी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर वह इस जिम्मेदारी को दूसरे पर थोप देता है तो वह लीडर नहीं बना रहेगा। अगर उसका कोई समर्थक कोई गलती करता है और अपने आपको अयोग्य सिद्ध करता है तो लीडर को यह मानना चाहिए कि गलती उसी की है और वही असफल हुआ है।

*कवि कृष्ण कुमार सैनी”राज”

दौसा,राजस्थान 

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।