‘निर्भया’ पूछ रही…

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vijaylakshmi
छोटी-छोटी बच्चियां हाथों में उपहार और माथे पर रोली का टीका लगाए घर-घर में जिमाई जा रही हैं। देवी की कृपा मिले, इसलिए हर कोई इन्हें आग्रह करके भोजन करवा रहा है,पूजन कर रहा है।मुझे याद आता है मेरा बचपन जब में भी इसी तरह कन्या के रुप में जाया करती थी। क्या जानती थी कि,कल मुझे देवी  कहने वाले ये ही लोग मेरी इज्जत और  जिंदगी छीन लेंगे ?
आज सोचती हूँ जब तक मुझ जैसी बच्चियों के जीवन नरक बना देने वाले ये बलात्कारी ओर ढोंगी लोग जिंदा हैं,माफ कीजिए-फल-फूल रहे हैं,तब तक नवरात्रि में देवी स्थापन और कन्या पूजन की परंपरा भी औपचारिकता ही है।
मैं पूछती हूँ बहुत हुआ,क्या इस नवरात्रि में हम कन्याओं की सुरक्षा और हर महिला के सम्मान की रक्षा का संकल्प ले सकते हैं? यदि नहीं तो, देवी की प्रसन्नता का भरम मन से निकाल दीजिए।
मैंने बचपन में पढ़ा था-‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते ततर देवता।’
नारी को पूजना सिर्फ नवरात्रि में,बाकी दिनों सिर्फ हवस का शिकार बनाना, अपनी दासी समझना और अत्याचार करना।
सदियों से जकड़ी हुई बेड़ियों से मुक्ति, उन परम्पराओं तथा रूढ़ मानसिकताओं से मुक्ति,खुलकर जीने की आजादी,घर- परिवार,सड़क और कार्यस्थल सभी जगह समान अधिकार,ये सब नहीं दे सकते तो मुझे माफ़ करना देवी पूजन और आराधना का कोई औचित्य नहीं है।   एक तरफ तो घर में देवी स्थापना और  पूजन,और दूसरी तरफ गृहस्वामिनी की छोटी-छोटी इच्छाओं की उपेक्षा होती है।इसी समाज में एक माँ अपने बेटे की सूरत देखने की आस में अकेले दम तोड़ देती है,इसी समाज में आए दिन कचरे के ढेरों में कन्या भ्रूण पाए जाते हैं,और इसी समाज में बच्चियां यौन शोषण और हिंसा का शिकार बनती है। कई तो बाबाओं के आश्रमों में नरक भोगती है और एक दिन जमीन में दफना दी जाती है। कब तक आखिर कब तक…?
मैं पूछना चाहती हूं,फिर देवी आराधना का क्या मतलब और देवी प्रसन्न होगी क्या भला..नहीं,कभी नहीं।
अंत ये नहीं, भयावहता की सीमा तो कुछ और भी है। कुछ बेड़ियां तो हमने खुद अपने लिए जुटाई हैं। कोमलता,लज्जा और भावनात्मकता के ऐसे गहने जो पैरों में बंधे उन्हीं को लहूलुहान कर रहे हैं।आखिर वो कौन-सी मजबूरियां है,जो हमें घर की चौखट लांघकर इन तथाकथित बाबाओं के चंगुल तक ले जाती हैं,हम इनको अपना सर्वस्य समर्पित कर देते हैं।
     साधु वेश में रावण घर आया और सीता को हर ले गया। मुझे ये देखकर तो और भी कष्ट हो रहा है कि,मैं निर्दोष थी मगर कुछ लोगों की हवस का शिकार होकर अपने जीवन को खो बैठी,पर मेरी बहिनें तो खुद इन रावणों के घर तक चल कर जा रही हैं। मैं पूछना चाहती हूं-आखिर किन मजबूरियों का लिबास इतना भारी हो गया कि,हमारी आत्मा आत्म सम्मान और गौरव को छोड़कर इन धूर्त-ढोंगी अमानवों के चंगुल में फस जाती हैं। मुझे शिकायत है उन मां और सासों से भी,जो पुत्र प्राप्ति या अन्य मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अपनी बेटियों-बहुओं को इन बाबाओंं के आश्रम ले जाती है। फिर चमत्कार के बहाने शुरु हुआ कुचक्र या तो उनकी हत्या पर खत्म होता है या,जीवनभर की यातना भुगतती है। ये सत्य हम सभी जानते हैं। आज से नहीं,हजारों साल से ये चला आ रहा है, मगर कुछ करते नहीं। धार्मिकता का भय हमारे मन में इतना गहरा भरा हुआ है कि,उसकी बलि चढ़ाते वक्त हमें यह भी याद नहीं रहता कि,डर के कारण हमारी देह और मन के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है,वो हमें अंदर-ही-अंदर खोखला कर देगा।
यह डर निडरता में बदले भी कैसे,मुझे न्याय मिलने में ५ साल लगे और राम रहीम जैसे बाबा के अपराध को साबित होने में १५ साल। कितनी यातनाएं और कष्ट झेले उन लोगों ने,जिन्होंने ये लड़ाई लड़ी ?इसका अंदाजा किसी को नहीं।
सिर्फ यही कारण होता,तो बात अलग थी कुछ महिलाएं तो स्वयं चकाचौंध एवं  विलासिता में डूबकर खुद को राम रहीम जैसों के हवाले कर देती है और दूसरी लड़कियों को भी फांसती हैं। कई मामलों में घर से अलगाव भी बड़ा कारण बनता है। ये घर-बार छोड़कर आश्रमों में रहने चली जाती है,जिनकी वजह से ये आश्रम अय्याशी तथा यौन शोषण के गढ़ बन जाते हैं। इनके फलने-फूलने में कई बड़े नाम और पद भी जुड़कर अपनी हवस की भूख मिटाते हैं।
आश्चर्य की बात ये है कि,ये हमारे घर नहीं आते,हम खुद चलकर इनके घर में जाते हैं।
क्यों हमारी वासनाओं,इच्छाओं और लालसाओं का वजन इतना बढ़ जाता है कि,हमारा स्त्रीत्व राम रहीम जैसे ढोंगी बाबाओं के सामने बीच जाता है।
मैं जीना चाहती थी,आखिरी सांस तक,मैं लड़ी,मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी,मगर अपनी बहनों की यह दशा देखकर मैं  कमजोर न पड़ जाऊँ!
इन बाबाओं का कारोबार बंद हो जाए, अगर कोई इनके दरवाजे न जाए।
इस नवरात्रि हमें दुर्गा बनकर इन महिषासुरों का मर्दन करना ही होगा।
अगर हम ये संकल्प कर सकते हैं तो,देवी जरूर कृपा करेंगी,वरन यूं ही रोज सड़क पर तो,कभी घरों में और कभी आश्रमों में अनगिनत ‘निर्भया’ तिल-तिल दफन होती रहेंगी। आपसे पूछती हूँ,देंगे आप मेरा साथ!
आपकी ‘निर्भया’।

                                                       #विजयलक्ष्मी जांगिड़

परिचय : विजयलक्ष्मी जांगिड़  जयपुर(राजस्थान)में रहती हैं और पेशे से हिन्दी भाषा की शिक्षिका हैं। कैनवास पर बिखरे रंग आपकी प्रकाशित पुस्तक है। राजस्थान के अनेक समाचार पत्रों में आपके आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। गत ४ वर्ष से आपकी कहानियां भी प्रकाशित हो रही है। एक प्रकाशन की दो पुस्तकों में ४ कविताओं को सचित्र स्थान मिलना आपकी उपलब्धि है। आपकी यही अभिलाषा है कि,लेखनी से हिन्दी को और बढ़ावा मिले।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।