‘नतोहम्’

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minakshi

उपन्यास अंश

आज सुबह आँख खुलने के साथ ही एल्विस को काकी की याद आई। वैसे काकी की याद तो उसे रोज ही आती थी, मगर आज रात उसने सपने में काकी को देखा था। वे कह रही थी – ‘बेटा, मैं शिप्रा के प्रवाह में हूँ…शिप्रा की लहरों में तुम मेंरी वाणी सुन सकते हो।’ जागते ही एल्विस ने तय कर लिया था कि सभी काम छोड़कर आज का दिन तो मैं काकी के साथ ही बिताऊँगा।

वह काकी के पास पहुँचा, काकी भी उसे देखकर बहुत खुश हुई।

‘आज अपन राजस्थान का खास खाना खाएंगे।’ वे बाल सुलभ उत्साह से छलकती बोली।

‘वॉव काकी’, एल्विस पर भी उस उत्साह की बूंदें पड़ी।

भीड़ में जगह बनाते हुए दोनों काफी दूर भूखी माता मंदिर के घाट की तरफ निकल आए।

यहां राजस्थानी शैली के द्वार तोरण देखकर एल्विस अपनी भूख ही भूल गया। उसने झटपट कैमरा निकाला, तस्वीरें खींचने लगा। यहां के स्वादिष्ट भोजन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगी थी। महिलाओं और पुरुषों की अलग-अलग कतार थी। काकी तो कतार में खड़ी हो गई। एल्विस फोटो खींचने में ही व्यस्त और मस्त रहा…डूबा रहा।

काकी ने उसे बुलाना चाहा, मगर फिर सोचा ‘वह तरह-तरह के द्वारों और तोरणों के फोटो ले रहा है, विघ्न डालना ठीक नहीं।’

द्वार, तोरण, भीड़ सभी की तस्वीरें खींचने के बाद एल्विस ने गहरी सांस ली। फिर महिलाओं की कतार में काकी को खोजने लगा। अब उसे तेज भूख भी महसूस होने लगी थी। तब तक वे काफी आगे पहुंच गई थी। एल्विस बेचैनी और व्यग्रता से उन्हें खोजता रहा, मगर वे उसे नहीं दिखी। वे भी उसे ही खोज रही थी, मगर उन्हें भी वह नहीं दिखा। उन्हें चिन्ता होने लगी।

तभी अचानक काकी की निगाह उस पर पड़ी।

‘एल्विस….’ काकी ने उसे आवाज दी, मगर भीड़-भाड़ और शोर में काकी की आवाज नक्कारखाने की तूती-सी होकर रह गई।

‘वो भी तो मुझे ही ढूंढ रहा है, उसके पास जाकर बता दूं।’ लाइन में अपने आगे-पीछे खड़ी महिलाओं से अपनी जगह का ध्यान रखने का कहकर वे भीड़ में किसी तरह जगह बनाती उसके पास पहुंची। उन्हें देख एल्विस को गर्मी में शीतल फुहारों की-सी राहत मिली।

‘मैं आवाज लगा रही थी, तुमने सुना ही नहीं ?’

‘मुझे तो सुनाई ही नहीं दिया, शायद शोर के कारण।’

‘मेरे पीछे आओ|’ काकी के पीछे चल दिया एल्विस।

‘एल्विस, औरतों वाली लाइन तो बहुत आगे आ गई है। तुम्हारी लाइन तो बहुत लम्बी है।’ काकी ने लाइन को देखा तो चिंतित हो गई।

एल्विस ने पुरुषों की लाइन की तरफ उधर नज़र डाली- ‘ओह ! यहां तो मेरा नंबर आधी रात तक आने से रहा।’ वह चितिंत हो गया।

‘कोई बात नहीं, मैं और किसी दिन आकर यहां का खाना टेस्ट कर लूंगा।’

‘अरे, ऐसा थोड़ी होता है। अपन कोई रास्ता निकालेंगे।’

‘छोड़ो काकी, आप भी बेवजह परेशान हो रही हैं। आप खा लीजिए, मैं गेस्ट हाउस जाकर खा लूंगा।’

‘अरे ! मैं अकेली थोड़ी खा सकती हूँ ।’ काकी ने फैसला सुनाया।

‘यही तो अपनापन है। यूं तो ये मेरी कोई नहीं हैं। फिर भी मुझे इतना अपना मानती हैं। मेरे देश में तो अपनों में भी इतना अपनापन नहीं होता। ये गैर होकर भी रखे हैं। यही है भारतीयों की भावनात्मक ऊर्जा के ऊंचे स्तर का राज। यह बात तो इनके संस्कारों में ही रच-बस गई है।’ एल्विस सोचने लगा।

काकी इधर-उधर देखने लगी। एल्विस भी उनके साथ ही आ जाए, इसके लिए कोशिश करने लगी। उन्होंने अपने साथ कतार में लगी अन्य महिलाओं से बात करके उन्हें तैयार भी कर लिया, मगर इतनी भीड़ की व्यवस्था के लिए पुलिस का इंतजाम था, वो भी बहुत कड़ा। मगर काकी ने एक बार ठान लिया, सो ठान लिया। वे एक तरफ खड़े पुलिस वाले के पास गई। उससे न जाने क्या कहा कि वो उनके साथ आया और एल्विस को उनके साथ भीतर ले गया।

बाद में एल्विस ने पूछा तो उन्होंने बताया- ‘मैंने सिपाही को तुम्हारे बारे में बताया था। उसे समझाया कि वह अपने देश के सिंहस्थ के नज़ारों की तस्वीरें खींचकर किताब बनाने के लिए इतनी दूर से आया है। वो फोटो खींचने में लगा था इसलिए पीछे रह गया। अब हम भोजन प्रसाद लेंगें तो साथ में, नहीं तो बिना लिए ही जाना होगा। तब वो मदद के लिए तैयार हो गया।’

‘और क्या काकी, देश प्रेम में पुलिस वाले पीछे थोड़ी रहेंगें।’ पंडाल के भीतर बहुत ही ठंडक थी। चारों तरफ कूलर चल रहे थे। साफ-सुथरी, गोबर लीपी जमीन पर सफेद पट्टियां बिछी थी। इनके आगे पटिये रखे थे। बीच-बीच में अगरबत्ती जल रही थी। उनकी खुशबू से वातावरण महक रहा था। पत्तलों में गरम-गरम भोजन परोसा जा रहा था। अनेक कार्यकर्ता आत्मीय मनुहार करते हुए मुस्तैदी से भोजन परोस रहे थे।

एल्विस, काकी के साथ बैठ गया। उनके आगे पत्तल- दोने रखे गए। एक आदमी आकर उन पर पानी छिड़क गया। काकी ने बताया कि इससे पत्तल शुध्द होती है। पानी के गिलास रखने के बाद भोजन परोसने का सिलसिला शुरू हुआ। गरम-गरम बाजरे का खिचड़ा, कढ़ी, गट्टे की सब्जी, दाल-बाटी, चूरमा….। खिचड़े में खूब सारा घी भी डाला गया। एल्विस को सबसे अधिक पसंद आया चूरमा और कढ़ी । जब काकी ने उसे बताया कि गरम कढ़ी पीने से सर्दी-जुकाम में आराम मिलता है तो वह हैरान हो गया। ‘और पता है बाजरे का खिचड़ा खाने से नींद अच्छी आती है। भूख भी बढ़ती है। पाचन से जुड़ी शिकायतें दूर होती हैं। हमारे यहां के भोजन में सारे औषधीय तत्व होते हैं।’

‘स्वाद का स्वाद…और दवा की दवा।’ पास बैठी महिला ने काकी की बात का समर्थन किया।

‘तभी तो काकी, सोचता हूं कि मैं यहां पैदा क्यों नहीं हुआ!’ काकी ने उसके गाल पर प्यार से चपत लगाई और वह हंसने लगा। आज का दिन काकी के साथ बिताकर उसे बहुत अच्छा लगा।

घूमता हुआ एल्विस भैरोगढ़ झोन की तरफ निकल आया। सुना था कि ‘उधर बहुत आगे एक प्लाट पर बहुत से विदेशी युवक-युवतियों ने डेरा डाल रखा है। उनमें एक युवती बांस को मुंह से बांसुरी की तरह बजाती है।’

वहां जाकर देखा, स्पेन से विदेशियों का एक समूह आया हुआ था। इन्होंने एक प्लाट पर संतों की ही तरह आश्रम बना रखा था। बात करने पर पता चला कि ये लोग उत्सुकतावश इलाहाबाद के कुंभ में आए थे। वहां भारतीय दर्शन और अध्यात्म से इतने प्रभावित हुए कि इंडियाज़ फेन्स नाम का एक क्लब बना लिया। क्लब के सदस्य सिंहस्थ में भी आए थे और परमानंद का लाभ ले रहे थे। इसी क्लब की सदस्य एक युवती के पास बांस का एक लंबा -सा वाद्य यंत्र था। इसे वह सांस खींचकर बजा रही थी।

एल्विस ने सुना तो मंत्रमुग्ध हो गया।

‘यह कौन-सा वाद्य यंत्र है?’ उसने पूछा

‘इसका नाम तो मैंने नहीं रखा। इसे बजाना यहीं भारत में ही सीखा है।’

‘यह तो बांसुरी के आधार पर ही बना है। बजाने का तरीका भी लगभग वैसा ही है।’ एल्विस ने सोचा। फिर उनसे पूछा- ‘यहां कैसा लग रहा है ?’

‘हम लोग सिंहस्थ में खूब घूम रहे हैं। मेला देख रहे हैं। मेले में भारतीय संस्कृति को भी जान रहे हैं। रोज तरह-तरह के लोगों से मिल रहे हैं। साधुओं से मिल रहे हैं। राम कथा, श्रीमद् भागवत गीता और प्रवचन सुनते हैं। रासलीला, रामलीला, सांस्कृतिक कार्यक्रम देखते हैं। संगीत के आयोजनों का आनंद लेते हैं। भजन, कीर्तन, योगासन, ध्यान में भागीदारी करते हैं। हमें भारतीय दर्शन, आध्यात्म और जीवन की बहुत-सी नई-नई बातें जानने को मिल रही हैं। हमारी जिज्ञासाओं का समाधान हो रहा है। इससे हमें बहुत शांति मिल रही है।’ एक सदस्य ने कहा।

दूसरे सदस्य ने कहा- ‘मैं तो चकित हो जाता हूं जब भव्य पंडालों को और उनकी सजावट को देखता हूं। लोग इतनी दूर-दूर से, इतनी धूप में इतनी तकलीफ उठाकर आते हैं, मगर उनके माथे पर शिकन तक नहीं उल्टे वे तो ताजगी और ऊर्जा से भरे आनंदित रहते हैं।’

‘यह भक्ति की शक्ति है दोस्त ।’ कहते हुए एल्विस भावुक हो गया।

‘कैसी शक्ति है भक्ति की कि लोग अपना काम-धंधा छोड़कर यहां साधु-संतों के दर्शन और सेवा में लगकर आनंदित हो रहे हैं। हाऊ इंट्रेस्टिंग…. मारवलस..। ये बिल्कुल अनोखी दुनिया है।’ एक ने कहा।

एक सदस्य इतने बड़े पैमाने पर चलने वाले अन्न क्षेत्र का मैनेजमेंट देखकर चमत्कृत थे ‘जिस आश्रम और अखाड़े में देखो, एक-से-बढ़कर एक पकवान। और आने वाले बेअंदाज, बेहिसाब और अनलिमिटेड। फिर भी सब मैनेज हो जाता है। वो भी इतने स्वादिष्ट, गर्मागर्म, बिल्कुल ताजा और पौष्टिक भी। तरह-तरह की सब्जियां, पूरी, रोटी, दाल, चावल, इडली, सांभर, साबूदाने की खीर और खिचड़ी, राजगीरे-सिंगाड़े के आटे की पूरी, मोरधन, कचौड़ी, गुलाबजामुन, श्रीखंड और भी कितनी तरह की मिठाइयां ! और मालवा की दाल-बाटी तो वाह ! मुंह में पानी आ गया, बात करते हुए। और पोहे, जलेबी कितने नाम गिनाएं। इनके सामने तो हमारे फास्ट फूड कुछ भी नहीं। हमारे यहां तो ऐसा खाना मिलने का कोई चांस ही नहीं है।’

‘सो तो है। यहां आकर ही तो हमें पता चला कि भौतिक सुख-सुविधाओं से ऊपर भी कोई टारगेट होते हैं। उन्हें पाने के लिए इतनी विकट साधना की जाती है। ये तो कोई और ही दुनिया लगती है। यहां आए तो पता चला कि इस देश में इतने साधु-संत हैं। ओ रियली इंडिया इज ग्रेट….!’

एक ने कहा-  ‘मुझे तो लगता है सिंहस्थ रोज होना चाहिए। रोज न भी हो सके, तो कम-से-कम साल में एक बार तो जरूर होना ही चाहिए।’

‘वो तो मुझे भी लगता है पर भाई, ऐसा नहीं होता है। सिंहस्थ तो बारह साल में एक बार ही आता है।’ एल्विस हंसने लगा।

 

 #डॉ. मीनाक्षी स्वामी

लेखन के क्षेत्र में डॉ. मीनाक्षी स्वामी का नाम अपरिचित नहीं है | एम.ए. तथा  पीएच.डी.(मुस्लिम महिलाओं की बदलती हुई स्थिति पर) तक शिक्षित डॉ. स्वामी की सम्प्रति प्राध्यापक पेशे से होकर आपको सतत तीस वर्ष का प्राध्यापकीय अनुभव है| आप इंदौर के दीनदयाल नगर( सुखलिया) में निवासरत हैं| सम्मान-पुरस्कार के  रूप में आपको केन्द्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा फिल्म स्क्रिप्ट ‘इस बार बरसात में ’ पर 1993 में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है तो केन्द्रीय गृह मंत्रालय  द्वारा ‘सामाजिक चेतना और विकास के संदर्भ में पुलिस की भूमिका का उद्भव ’ पुस्तक पर पं. गोविन्दवल्लभ पंत पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है | इसके अलावा भी लेखन के क्षेत्र में कई सम्मान मिले हैं| कहानी और लेखन के क्षेत्र में इनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी है,खास तौर पर प्रकाशित कृतियाँ-उपन्यास- भूभल (पुरस्कृत), नतोहम् (पुरस्कृत व अटलबिहारी विश्‍वविद्यालय, भोपाल के स्नातक पाठ्यक्रम में ),कहानी संग्रह- अच्छा हुआ मुझे शकील से प्यार नहीं हुआ और धरती की डिबिया (संग्रह की कुछ कहानियां भारतीय भाषाओं में अनूदित)है| वर्तमान में आप श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इंदौर में मंत्री हैं। साहित्य अकादमी, म.प्र. द्वारा अखिल भारतीय राजा वीरसिंह देव पुरस्कार से सम्मानित यह कृति अटल बिहारी बाजपेई हिन्दी विश्वविद्यालय, भोपाल के बी.ए. के पाठ्यक्रम में शामिल है। आकाशवाणी द्वारा इसका धारावाहिक नाट्य रूपान्तरण भी किया गया है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।