दर्द मिटाए मधुशाला

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niraj tyagi
सुना  है   बहुत  मंद  उजाले   है   मधुशाला  में ,
शायद जुगनू भटकते है वहाँ दिन ढले पैमानों में,
शब्दो को यूँ  तो  हर कोई गुनगुनाता है अक्सर,
मतलब समझ आता है उनको जो खुद को डूबा
आया    मधुशाला    के    मय    के   प्यालो   में ,
मधुशाला में कहीं किसी को आईने की जरूरत नही है,
यहाँ  अगर  किसी  ने  कभी  खुद  को डुबाया मय में,
वो   खुद   ही   अपने   चेहरे   का   नकाब  हटाकर
सच्चाई    अपनी     दिखाने     लगा     मधुशाला    में,
हर जख्म जो कोई किसी का अपना भी नही समझता,
उस को भी अनजान शख्स पहचान लेता है मधुशालो में,
दिन में अक्सर जो जीवन से थककर हार मान गया है,
रात  को  मय  में  डूबकर  जीत  गया  है वो जमाने को,
कहीं भी किधर भी जाओ हर तरफ दर्द बढ़ता ही जाता है।
मधुशाला  में  जाने  पर  हर  दर्द  खुद  ही मिटता जाता है।।
नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।