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prabhanshu
निराश नही है
अपनी जिन्दगी से
जो सड़क के किनारे लगे
कूढ़े को उठाता हुआ
अपनी प्यासी अॉखो से
कुछ दूढ़ता हुआ
फिर सड़क पर चलते
हंसते खिलखिलाते
धूलउडाते लोगो को टकटकी
निगाह से देखता
फिर कुछ सोचकर
अपनी नजरे
दुबारा अपने काम पर टिका लेता
शायद ये
सब मेरे लिए नही
वह सोचता है
अखिर कमल को हर बार
कचरा क्यों मिलता है
वह आदमी
दौड के उस कूढे को उठाता
जैसे उसे ईश्वर का प्रसाद मिल गया हो
जैसे तालाब के किनारे
कमल खिल गया हो
फिर सड़क पर लोग नही है
प्लास्टिक के थैले नही है
आैर चल देता है
दूसरे कूढ़े की आेर
शायद अपनी किस्मत को कोसते हुए
बस यही है मेरी जिन्दगी.
              #प्रभांशु कुमार

परिचय : प्रभांशु कुमार, इलाहाबाद के तेलियरगंज में रहते हैंl जन्म १९८८ में हुआ है तथा शिक्षा एमए(हिन्दी) और बीएड हैl आपकी सम्प्रति शिक्षा अनुसंधान विकास संगठन(इलाहाबाद) में सम्भागीय निदेशक की हैl आपकी अभिरुचि साहित्य तथा निबंध में हैl आपकी प्रकाशित रचनाओं मेंख़ास तौर से आधुनिकता,खोजता हूं,वक्त और स्मार्ट सिटी ने छीन लिया फुटपाथ सहित काव्य संग्रह-मन की बात में प्रकाशित चार कविताएँ हैंl निबन्ध लेखन में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत होने के साथ ही आकाशवाणी इलाहाबाद से कविताओं का प्रसारण भी हो चुका हैl  

 
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