कहाँ खो गए वो ढोल मंजीरे कहाँ खो गए वो गीत..

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swayambhu
हमारे देश के व्रत त्योहार हमारी गौरवशाली परंपरा और संस्कृति का दर्पण हैं। देश की अनेकता में एकता की जो झाँकी दिखाई देती है उसमें हमारी समृद्ध परंपराओं और पर्वों का विशेष योगदान है। पहले तो गांवों में वसंत पंचमी से ही फागुनी गीतों की बयार बहने लगती थी। महीने भर पहले से ही चौपालों पर ढोल मंजीरे की थाप के साथ जोगीरा गूंजने लगता था। फाग, मल्हार, झूमर, चैता और बारहमासा जैसे विभिन्न रागों में भारतीय लोक संस्कृति की बहुरंगी झलक दिखाई देती थी। साथ मिलकर गाने बजाने वाले लोगों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द भी खूब झलकता था।
बदलते दौर में फागुनी गीतों की जगह भोजपुरी के फूहड़ और अश्लील गीतों ने ले लिया। अश्लील गीत लिखने और गाने वालों ने सारी हदें पार करते हुए हमारी परंपरा और अस्मिता पर ही हमला बोल दिया। डर है कि होली के रंग गुलाल और गीत संगीत की मधुरता इस फूहड़ शोर में कहीं खो न जाय।
आज ऐसे गीतों के सीडी, डीवीडी, आडियो, वीडियो और एलबम से बाजार भरे पड़े हैं। कहीं डेक तो कहीं डीजे पर ऐसे गीत गूंज रहे हैं। कुछ लोग इस फूहड़पन में भी आनंद ले रहे हैं। क्या शहर क्या गांव हर चौक चौराहे पर ऐसा नजारा दिखने लगा है।
परिवार या बच्चों के साथ इन टोलियों के सामने से गुजर गए तो शर्मशार होना तय है।
समस्या इनके नाचने गाने से नहीं है। होली तो त्यौहार ही है आनंद और उमंग का। समस्या उन फूहड़ गानों से है जिन पर ये लोग मग्न हैं बिना यह सोचे कि ये गाने हमारी परंपराओं को किस गर्त्त में ले जा रहे हैं।
यह सिलसिला अब यहीं तक सीमित नहीं है। शादी ब्याह के पंडालों से लेकर बैंड बाजे वालों तक इन गानों की पैठ हो चुकी है।
जगह जगह आयोजित होने वाले दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा के आयोजनों में भी मूर्ति विसर्जन के समय लड़के ऐसे अश्लील गानों पर झूमते  नाचते नजर आ जाते हैं। पंडालों में इन गानों के तर्ज़ पर भक्ति गीत सुनाई देने लगे हैं।
आस्था और भक्ति भी इन अश्लील गानों की भेंट चढ़ने लगी है।
पैसों के लिए अपनी भाषा की गरिमा को धूल में मिलाने वाले, सस्ती लोकप्रियता के भूखे ऐसी फिल्में बनाने वाले, ऐसे गीत लिखने और गाने वाले इस पीढ़ी को बरबाद करने पर तुले हैं। इन लोगों की वजह से भोजपुरी भाषा भाषी क्षेत्रों की छवि पूरे देश में खराब हो रही है।
यहां बड़ा सवाल यह भी है कि आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता फैलाकर हमारी मातृभाषा और हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने का हक इन्हें किसने दिया। ये न्यायालय के सामने भी दोषी हैं और समाज के सामने भी। इन्हें दंड भी न्यायालय और समाज दोनों के द्वारा मिलना चाहिए।
वाहनों में या सार्वजनिक स्थलों पर द्विअर्थी भोजपुरी गीत बजाने को लेकर पटना उच्च न्यायालय ने भी सख्ती दिखाई है लेकिन
सरकार और प्रशासन चाहे जो भी कदम उठाये यह प्रयास तब तक सफल नहीं होगा जब तक कि हम सब मिलकर ऐसी फिल्मों, ऐसे गानों का पूर्ण रूप से बहिष्कार नहीं करेंगे।
यह समय की मांग है कि अश्लीलता मुक्त भोजपुरी अभियान को हर गांव, हर शहर में शुरू किया जाय तभी शायद हम एक सभ्य समाज में जीने का दावा कर सकेंगे।
हर सामाजिक संघ संगठन को खुल कर इस अभद्रता के खिलाफ आगे आना चाहिए। छात्र संगठनों को तो इसे मुख्य मुद्दा बनाना चाहिए।
साथ ही विभिन्न संघ संगठनों के द्वारा उन गीतकारों, गायकों एवं फिल्मकारों को
सम्मान देने की एक स्वस्थ परंपरा भी शुरू की जानी चाहिए जो हमारी क्षीण होती लोक संस्कृति को बचाने में लगे हैं।

#डॉ. स्वयंभू शलभ

परिचय : डॉ. स्वयंभू शलभ का निवास बिहार राज्य के रक्सौल शहर में हैl आपकी जन्मतिथि-२ नवम्बर १९६३ तथा जन्म स्थान-रक्सौल (बिहार)है l शिक्षा एमएससी(फिजिक्स) तथा पीएच-डी. है l कार्यक्षेत्र-प्राध्यापक (भौतिक विज्ञान) हैं l शहर-रक्सौल राज्य-बिहार है l सामाजिक क्षेत्र में भारत नेपाल के इस सीमा क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए कई मुद्दे सरकार के सामने रखे,जिन पर प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री कार्यालय सहित विभिन्न मंत्रालयों ने संज्ञान लिया,संबंधित विभागों ने आवश्यक कदम उठाए हैं। आपकी विधा-कविता,गीत,ग़ज़ल,कहानी,लेख और संस्मरण है। ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं l ‘प्राणों के साज पर’, ‘अंतर्बोध’, ‘श्रृंखला के खंड’ (कविता संग्रह) एवं ‘अनुभूति दंश’ (गजल संग्रह) प्रकाशित तथा ‘डॉ.हरिवंशराय बच्चन के 38 पत्र डॉ. शलभ के नाम’ (पत्र संग्रह) एवं ‘कोई एक आशियां’ (कहानी संग्रह) प्रकाशनाधीन हैं l कुछ पत्रिकाओं का संपादन भी किया है l भूटान में अखिल भारतीय ब्याहुत महासभा के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विज्ञान और साहित्य की उपलब्धियों के लिए सम्मानित किए गए हैं। वार्षिक पत्रिका के प्रधान संपादक के रूप में उत्कृष्ट सेवा कार्य के लिए दिसम्बर में जगतगुरु वामाचार्य‘पीठाधीश पुरस्कार’ और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अखिल भारतीय वियाहुत कलवार महासभा द्वारा भी सम्मानित किए गए हैं तो नेपाल में दीर्घ सेवा पदक से भी सम्मानित हुए हैं l साहित्य के प्रभाव से सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-जीवन का अध्ययन है। यह जिंदगी के दर्द,कड़वाहट और विषमताओं को समझने के साथ प्रेम,सौंदर्य और संवेदना है वहां तक पहुंचने का एक जरिया है।

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।