कवि सम्मेलन की अनूठी परम्परा व हास्य कवि प्रदीप चौबे

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gopal narsan
श्रद्धांजलि….
1949 में जन्मे प्रदीप चौबे के बिना हर हास्य महफिल अधूरी थी। आखिरी बार होली के समय कपिल शर्मा शो के जरिए वो सार्वजनिक मंच पर दिखे थे।उनके करीबी कहते हैं कि वो जितना लोगों को हंसाते थे, उतना ही अपने अंदर के दु:खों को छुपाए रहते थे।उन्हें गॉल ब्लैडर का कैंसर भी था।
 वो जो मशहूर मसखरा होगा, आंख से कंठ तक भरा होगा’, लिखने वाले मशहूर हास्य कवि प्रदीप चौबे अब नहीं रहे। वे 70 साल के थे। ग्वालियर में  दिल का दौरा होने पर उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।
कविताओं में हंसी के साथ व्यंग्य का पुट देने में माहिर चौबे, बीते कुछ दिनों से छोटे बेटे की हुई अचानक मौत के सदमे में थे। कॉमेडियन कपिल शर्मा के शो पर अंजुम रहबर और अरुण जैमिनी के साथ उन्होंने दुनियां को गुदगुदाया था।  उन्होंने कभी किसी से अपने दुखों का जिक्र तक नहीं किया। कई बीमारियों को हराने के बाद आखिरकार खुद भी बीमारी से ही हारे और सबको छोड़ कर चले गए।
 सच मे कवियों का संसार में एक अलग महत्व है। प्रत्येक मनुष्य स्वयं में एक कवि है। यह इतिहास उन महान कवियों का सम्मान करता है। जो संसार को ढेरों ज्ञान से भर गये। जो स्वयं का भविष्य रचता है, वह भी एक कवि है। मैं स्वयं को उस पहलू पर न पहुँचा सकी। जिस पहलू पर एक कवि होता है।
कवि सम्मेलन का इतिहास बहुत पुराना है। इसलिए कवि-सम्मेलनों के आरम्भ की तिथि का तो पता नहीं है। परन्तु १९२० में पहला वृहद कवि सम्मेलन हुआ था जिसमें कई कवि और श्रोता था। उसके बाद कवि सम्मेलन भारतीय संस्कृति का अभिन्न भाग बन गया। आज भारत ही नहीं, वरन पूरे विश्व में कवि सम्मेलनों का आयोजन बड़े पैमाने पर होता है। भारत में स्वतंत्रता (१९४७) के बाद से ८० के दशक के आरम्भिक दिनों तक कवि सम्मेलनों का ‘स्वर्णिम काल’ कहा जा सकता है। ८० के दशक के उत्तरार्ध से ९० के दशक के अंत तक भारत का युवा बेरोज़गारी जैसी कई समस्याओं में उलझा रहा। इसका प्रभाव कवि-सम्मेलनों पर भी हुआ और भारत का युवा वर्ग इस कला से दूर होता गया। मनोरंजन के नए उपकरण जैसे टेलीविज़न और बाद में इंटरनेट ने सर्कस, जादू के शो और नाटक की ही तरह कवि सम्मेलनों पर भी भारी प्रभाव डाला। कवि सम्मेलन सख्यां और गुणवत्ता, दोनों ही दृष्टि से कमज़ोर होते चले गए। श्रोताओं की संख्या में भी भारी गिरावट आई। इसका मुख्य कारण यह था कि विभ्न्न समस्याओं से घिरे युवा दोबारा कवि-सम्मेलन की ओर नहीं लौटे। साथ ही उन दिनों भीड़ में जमने वाले उत्कृष्ट कवियों की कमी थी। लेकिन नई सहस्त्राब्दी के आरम्भ होते ही युवा वर्ग, जो कि अपना अधिकतर बचा हुआ समय इंटरनेट पर गुज़ारता था, कवि सम्मेलन को पसन्द करने लगा। इंटरनेट के माध्यम से कई कविताओं की वीडियो उस वर्ग तक पहुंचने लगी। युवाओं ने नय वीडियो तलाशना, उन्हें इंटरनेट पर अपलोड करना, डाउनलोड करना और आपस में बांटना आरम्भ किया। लगभग पांच वर्षों के भीतर लाखों युवा कवि सम्मेलनों को पसन्द करने लगे। इस पीढ़ी की कवि सम्मेलनों की ओर ज़ोरदार वापसी का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है, कि यू-ट्यूब नामक वेबसाईट पर एक कवि की प्रस्तुति को साढे मांच लाख से भी अधिक लोगों ने अब तक देखा है[
२००४ से ले कर २०१० तक का काल हिन्दी कवि सम्मेलन का दूसरा स्वर्णिम काल भी कहा जा सकता है। श्रोताओं की तेज़ी से बढती हुई संख्या, गुणवत्ता वाले कवियों का आगमन और सबसे बढ़ के, युवाओं का इस कला से वापस जुड़ना इस बात की पुष्टि करता है। पारम्परिक रूप से कवि सम्मेलन सामाजिक कार्यक्रमों, सरकारी कार्यक्रमों, निजी कार्यक्रमों और गिने चुने कार्पोरेट उत्सवों तक सीमित थे। लेकिन इक्कईसवीं शताब्दी के आरम्भ में शैक्षिक संस्थाओं में इसकी बढती संख्या प्रभावित करने वाली है। जिन शैक्षिक संस्थाओं में कवि-सम्मेलन होते हैं, उनमें आई आई टी,आई आई एम,एन आई टी,विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन और अन्य संस्थान शामिल हैं। जिससे स्पष्ट है कि कवि सम्मेलनों का रूप बदल रहा है।
दुनिया का कोई भी भाग आज कवि सम्मेलनों से अछूता नहीं है। भारत के बाद सबसे अधिक कवि सम्मेलन आयोजित करवाने वाले देशों में अमरीका, दुबई, मस्कट, सिंगापोर, ब्रिटेन इत्यादि शामिल हैं। इनमें से अधिकतर कवि सम्मेलनों में भारत के प्रसिद्ध कवियों को आमंत्रित किया जाता है। भारत में वर्ष भर कवि सम्मेलन आयोजित होते रहते हैं। भारत में कवि सम्मेलन के आयोजकों में सामाजिक संस्थाएं, सांस्कृतिक संस्थाएं, सरकारी संस्थान, कार्पोरेट और शैक्षिक संस्थान अग्रणी हैं। पुराने समय में सामाजिक संस्थान सबसे ज़्यादा कवि-सम्मेलन करवाते थे, लेकिन इस सहस्त्राब्दी के शुरूआत से शैक्षिक संस्थानों ने सबसे ज़्यादा सम्मेलन आयोजित किए हैं।
कवि सम्मेलनों के आयोजन के ढंग में भी भारी बदलाव आए हैं। यहां तक कि अब कवि सम्मेलन इंटरनेट पर भी बुक किए जाते हैं[
कवि सम्मेलन के पारम्परिक रूप में हालांकि बहुत अधिक बदलाव नहीं देखे गए हैं। एक पारम्परिक कवि सम्मेलन में अलग अलग रसों के कुछ कवि होते हैं और एक संचालक होता है। कवियों की कुल संख्या वैसे तो २० या ३० तक भी होती है, लेकिन साधरणत: एक कवि सम्मेलन में ७ से १२ तक कवि होते हैं। २००५ के आस पास से कवि सम्मेलन के ढांचे में कुछ बदलाव देख्ने को मिले। अब तो एकल कवि सम्मेलन भी आयोजित किए जाते हैं।  पारम्परिक कवि सम्मेलन में कवि मंच पर रखे गद्दे पर बैठते हैं। मंच पर दो माईकें होती हैं- एक वह, जिस पर खड़े हो कर कवि एक एक कर के कविता-पाठ करते हैं और दूसरा वो, जिसके सामने संचालक बैठा रहता है। संचालक सर्वप्रथम सभी कवियों का परिचय करवाता है और उसके बाद एक एक कर के उन्हें काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित करता है। इसका क्रम साधारणतया कनिष्ठतम कवि से वरिष्ठतम कवि तक होता है।
कवि सम्मेलन मंचों पर अब तक हज़ारों कवि धाक जमा चुके हैं, लेकिन उनमें से कुछ ऐसे हैं जिनको मंच पर अपनी प्रस्तुति के लिए सदा याद किया जाएगा। उनमें से रामधारी सिंह ‘दिनकर’, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’,हरिवंश राय बच्चन, श्याम नारायण पाण्डेय, दामोदर स्वरूप ‘विद्रोही’, महादेवी वर्मा, काका हाथरसी, शैल चतुर्वेदी, बालकवि बैरागी, स्वर्गीय राजगोपाल सिंह, स्वर्गीय डॉ० उर्मिलेश शंखधार, डा सुरेन्द्र शर्मा, उदय प्रताप सिंह, स्वर्गीय ओम प्रकाश आदित्य, स्वर्गीय हुल्लड़ मुरादाबादी, स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी, स्वर्गीय नीरज पुरी, माया गोविन्द, प्रदीप चौबे, इंदिरा इंदु, माया गोविंद, प्रभा ठाकुर, स्वर्गीया मधुमिता शुक्ला, आशीष अनल, दुर्गादान गौड़, मधुप पाण्डेय, हरिओम पँवार, अभय निर्भीक, सूर्यकुमार पांडेय,दिनेश चन्द्र पाण्डेय(नज़र इलाहाबादी), जगदीश सोलंकी, अरुण जैमिनी, विनय विश्वास, विष्णु सक्सेना, संजय झाला, विनीत चौहान, डॉ सरिता शर्मा, डॉ कीर्ति काले, सुरेंद्र दुबे, डॉसुनील जोगी, गजेंद्र सोलंकी, प्रवीण शुक्ल, डॉ सुमन दुबे, आश करण अटल, महेंद्र अजनबी, वेदप्रकाश वेद, स्वर्गीय ओम व्यास ‘ओम’ डॉ० कुमार विश्वास, संपत सरल, शैलेश लोढ़ा, चिराग़ जैन, पवन दीक्षित, रमेश मुस्कान, तेज नारायण शर्मा, अर्जुन सिसोदिया, गजेंद्र प्रियांशु, सचिन अग्रवाल, मनीषा शुक्ला, संदीप शर्मा, राहुल व्यास, मनवीर मधुर, वीनू महेंद्र, कृष्णमित्र, स्वर्गीय शरद जोशी, स्वर्गीय आत्मप्रकाश शुक्ल, स्वर्गीय भारत भूषण, स्वर्गीय रमई काका, स्वर्गीय रामवतार त्यागी, स्वर्गीय देवल आशीष, घनश्याम अग्रवाल जीतेन्द्र कानपुरी आदि अग्रणी हैं।
#श्रीगोपाल नारसन
परिचय: गोपाल नारसन की जन्मतिथि-२८ मई १९६४ हैl आपका निवास जनपद हरिद्वार(उत्तराखंड राज्य) स्थित गणेशपुर रुड़की के गीतांजलि विहार में हैl आपने कला व विधि में स्नातक के साथ ही पत्रकारिता की शिक्षा भी ली है,तो डिप्लोमा,विद्या वाचस्पति मानद सहित विद्यासागर मानद भी हासिल है। वकालत आपका व्यवसाय है और राज्य उपभोक्ता आयोग से जुड़े हुए हैंl लेखन के चलते आपकी हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकें १२-नया विकास,चैक पोस्ट, मीडिया को फांसी दो,प्रवास और तिनका-तिनका संघर्ष आदि हैंl कुछ किताबें प्रकाशन की प्रक्रिया में हैंl सेवाकार्य में ख़ास तौर से उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए २५ वर्ष से उपभोक्ता जागरूकता अभियान जारी है,जिसके तहत विभिन्न शिक्षण संस्थाओं व विधिक सेवा प्राधिकरण के शिविरों में निःशुल्क रूप से उपभोक्ता कानून की जानकारी देते हैंl आपने चरित्र निर्माण शिविरों का वर्षों तक संचालन किया है तो,पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों व अंधविश्वास के विरूद्ध लेखन के साथ-साथ साक्षरता,शिक्षा व समग्र विकास का चिंतन लेखन भी जारी हैl राज्य स्तर पर मास्टर खिलाड़ी के रुप में पैदल चाल में २००३ में स्वर्ण पदक विजेता,दौड़ में कांस्य पदक तथा नेशनल मास्टर एथलीट चैम्पियनशिप सहित नेशनल स्वीमिंग चैम्पियनशिप में भी भागीदारी रही है। श्री नारसन को सम्मान के रूप में राष्ट्रीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा डॉ.आम्बेडकर नेशनल फैलोशिप,प्रेरक व्यक्तित्व सम्मान के साथ भी विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ भागलपुर(बिहार) द्वारा भारत गौरव
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।