उठ जाग मुसाफिर भोर भई..

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rajkumar
भजन पुराना है किन्तु बार-बार ,गुनगुनाया है,परन्तु क्या हम उठ चुके हैं? नहीं! हम अभी तक गहरी निंद्रा में सोए हुए हैं। आप कहेंगे-हम सोए कहाँ हैं,हम तो पौ फटने के साथ ही उठ गए थे,लेकिन मैं कहूँगा कि हम भगवान राम और कृष्ण के अनुयायी अभी जागे नहीं,सोए हुए ही हैं। कारण सरकार आए दिन नए क़त्लखाने खोलती जा रही है,जिसमें प्रतिदिन लाखों पशुओं का कत्ल होगा। इस बात से अनभिज्ञ मेरे अहिंसक भाईयों व बहिनों हम सोए हुए हैं या जागे हुए? सृष्टि को बचाने के लिए खोना नहीं,बल्कि पाना है।
भारतीय शास्त्रों और दर्शन का अहिंसापरक सिद्धान्त सम्पूर्ण सृष्टि पर समान रूप से लागू होता है,क्योकिं जीवन जीने का यही एक मात्र उपाय है। ‘धम्मो मंगल मुक्किट्ठं,अहिंसा संजमो तवो’,अर्थात् धर्म उत्कृष्ट मंगल है,अहिंसा,संयम,तप धर्म है। अहिंसा का डंका तो हमने बहुत बजा लिया,किन्तु इस डंके की गूंज हमारे कानों में अभी तक नहीं आई। जिस भारत भूमि पर कभी दूध की नदियाँ बहा करती थी,आज वहाँ पशुओं का रक्त बह रहा है। बेजुबान पशु भारत ‘अहिंसापरक’ सिद्धान्त की ओर पथराई दृष्टि से देख रहा है,पूछ रहा है हमसे- ‘जीओ और जीने दो’ का सिद्धान्त क्या हम पर लागू नहीं होता? क्या जवाब दें हम उन्हें? क्या हमारा संकल्प उन्हें कोई न्याय दिला सकता है? अगर नहीं,तो हम सब कुछ खो देंगे और भजन की पंक्तियाँ,पंक्तियाँ ही बनकर रह जाएंगी। अहिंसा के उपदेश के लिए भगवान ने इस धरा पर अपने अनेक प्रतिनिधि भेज रखे हैं,यह समझाने के लिए कि ‘निउण दिट्ठा भुएसु संजमो’,यानी सब प्राणियों की संयम पालक अहिंसा अनन्त सुखों को देने वाली है। हिंसा से हम खण्डित हो सकते हैं,एक-दूसरे से बिछुड़ सकते हैं। यह धर्म नहीं,धर्म वहाँ है जहाँ हम एक-दूसरे से जुड़ते हैं,एकत्व में प्रतिष्ठित होते हैं।
संतों की वाणी सुनकर हम एक कदम आगे की ओर चलते हैं,किन्तु कानून व सरकार का सामना करने की हममें हिम्मत नहीं है। इसलिए,हम दो कदम पीछे की ओर हट जाते हैं। एक अकेला ‘अन्ना हजारे’ देश की सरकार को हिला सकता है तो क्या अहिंसा के मार्ग पर चलने वाला प्रत्येक नागरिक सरकार को झुका नहीं सकता है। बड़ी-बड़ी तपस्या,पंडितमरण हमने कई देखे-सुने हैं। कोई वीर है,जो आमरण-अनशन कर हिंसा के दरवाजे पर अहिंसा की माला जड़ दे। वर्तमान में अहिंसापरक सिद्धान्त को अक्षुण्ण रखने के लिए साम्प्रदायिकता के दायरे से हटकर कंधे-से-कंधा मिलाकर पुरजोर स्वर में शंखनाद करना होगा-‘जीओ और जीने दो’। ‘अहिंसा परमोधर्म’-अहिंसा ही परम धर्म है। इस नव वर्ष पर हम अपनी कर्म-तपस्या इसी संकल्प के साथ प्रारम्भ करें कि,किसी भी कीमत पर देश में नए बूचड़खाने न खुलने पाएं।
                                                                                     #राजकुमार जैन ‘राजन’
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matruadmin

4 thoughts on “उठ जाग मुसाफिर भोर भई..

  1. आदरणीय आपका लेख अच्छा लगा। क्या आप जानते हैं कि उठ जाग मुसाफिर भोर भई के रचनाकार कौन हैं

  2. आदरणीय आपका लेख अच्छा लगा। क्या आप जानते हैं कि उठ जाग मुसाफिर भोर भई के रचनाकार कौन हैं

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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।