इतिहास की कब्र में दफ़न है शहीद शिशु अजय सिंह

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avdhesh

जिसकी किलकारियों से गूँजा हो जम्मू, जिसके वैराग से पावन हुआ हो माँ गोदावरी का कूल, जिसकी बहादुरी का साक्षी हो सतलज और जिसके बलिदानों के समक्ष बौना हो गया हो गगनचुम्बी कुतुबमिनार। उस बंदा बहादुर वैरागी के एकलौते सपूत का नाम था अजय सिंह जिसकी कुर्बानी के जज़्बे पर स्तब्ध हो जाता है इतिहास……पुनरावृत्ति लगती है गुरु गोबिन्द सिंह के जाबाज बेटों की।

सन् 1716 के जून माह में धरती तवे के समान जल रही थी। बंदा वैरागी के सभी साथियों की 9 दिनों में प्रतिदिन 100 की दर से हत्या कर दी गई जिसका गवाह मार्च का रात – दिन समान होना था। दिल्ली क्रूर मुगलों के अत्याचार से विधवा विलाप करने को विवश थी। धधकती आग में दर्जन भर चिमटे धधकाए जा रहे थे। जल्लाद की भूमिका में दर्जनों खूँखार मुगल अट्टहास कर रहे थे। उस वक्त बंदा वैरागी की वीरता को चुनौती दे रहा था उनका ही पाँच वर्षीय पुत्र। ज़ालिम जल्लाद जलते हुए चिमटों से बंदा वैरागी के माँस नोचते। अंगद पाँव जमाए वीर अजय सिंह अटल रहता। एक जल्लाद दोनों हाथों में गर्म सलाखें लिए अजय के पास आकर फिर वही सवाल दुहराता है, ‘इस्लाम कुबूल कर लो। हम दोनों को आजाद कर देंगे।’ तब तक उसकी दाढ़ी अजय सिंह के थूकों से भींग गई थी। गुस्से को जब्त करता हुआ वह मुगल बंदा वैरागी से पूछा,’ अब तुम कैसे मरना चाहते हो?’ बंदा वैरागी की आवाज गूँजी, ‘अब मैं मौत से नहीं डरता, यह शरीर ही दु:ख का कारण है।’ बाप – बेटे की अद्वितीय वीरोचित प्रतिस्पर्धा ने कसाइयों की हैवानियत को परास्त कर दिया। लाचार दिल्ली की सल्तनत ने बंदा वैरागी के फौलादी जिस्म को नोच नोचकर माँस विहीन कर दिया था किन्तु न बाप डिगा न बेटा। अन्तत: मुगलों ने इब्राहिम के बलिदान का खेल बंदा के साथ खेला। बाप की गोद में बेटे को लिटा दिया और बाप को छुरी पकड़ाकर कत्ल करने का फरमान हुआ। बाप ने फरमान को मानने से इंकार कर दिया। अब जो खेल खेला गया वह किसी भी हैवानियत से भयानक था। निर्भीक अजय सिंह को गोद से घसीटकर हवा में लहरा दिया गया और ज़ालिम तलवार ने उस नन्हें से शिशु के दो फाँक कर दिए। फिर शहीद बेटे के शव से माँस नोचकर बाप के मुँह में ठूँस दिया गया किन्तु वहाँ रोने वाला कोई नहीं था। बंदा तो फिर से बैरागी हो गया था…..विदेह हो गया था। भारत माता का अद्भुत लाल पाँच वर्षीय वीर अजय सिंह गुरु गोविन्द सिंह के नौ और सात वर्षीय शहीद पुत्र जोरावर सिंह और फतह सिंह की पंक्ति में शामिल हो गया था।

27 अक्टूबर 1670 को राजौरी, जम्मू में श्री रामदेव के घर एक अद्भुत बालक ने जन्म लिया जिसका नाम लक्ष्मन दास रखा गया। 15 वर्ष का लक्ष्मन दास बहुत होनहार था और शिकार खेलने का शौकीन भी। एक दिन उसका तीर एक गर्भवती हिरनी को जा लगा। बच्चा बाहर आया और इहलीला समाप्त। पल भर में सब कुछ इस बालक के सामने घटा। गुरु जानकीनाथ से सलाह लेकर लक्ष्मन दास निकल पड़ा वैराग के पथ पर। पंचवटी (नासिक) से होता हुआ गोदावरी के तट पर सन्यासी बन गया। माधोदास के नाम से ख्याति दूर- दूर तक फैल गई।

गुरु गोविन्द सिंह एक ऐसे बहादुर का नाम है जिसने न सिर्फ अपने पिता गुरु तेगबहादुर को बल्कि अपने चारों पुत्रों को भी शहादत के पथ पर वक्त के तकाजे पर भेजा। विशालकाय आततायी मुगल सेना से लोहा लेते हुए बहुतों को खो चुके थे गुरु गोविन्द सिंह। सन् 1708 में गोदावरी परिक्षेत्र के नांदेड़ में घूमते हुए गुरु गोविन्द सिंह को माधोदास के बारे में पता चला और वे चल दिए मिलने। मुलाकात के दौरान गुरु ने माधोदास को दीक्षा देते हुए कहा,’स्वमुक्ति छोड़कर देशमुक्ति करो। आज से तुम्हारा नाम बंदा बहादुर वैरागी होगा।’ इसके साथ ही वर्तमान राजनीति को समझाते हुए गुरु गोविन्द सिंह ने बंदा को पाँच तीर, एक निशान साहिब, एक नगाड़ा और एक हुक्मनामा देकर विदा किया। गुरु तेगबहादुर का हत्यारा जलालुद्दीन और गुरु गोविन्द सिंह के दो छोटे बेटों को दीवार में चिनवाने वाला सरहिन्द का नवाब वज़ीर खान से बदला लेना बंदा वैरागी की प्राथमिकता थी।
हजारों शिष्यों के साथ बंदा बहादुर का काफिला चला। साधक के हाथों में शस्त्र ने दुश्मनों को गाजर- मूली बनाकर खेत कर दिया। जलालुद्दीन और वज़ीर खान के साथ वे सब भी मारे गए जो मुगलों के हिमायती और हिन्दुओं के विश्वासघाती थे। गुरु गोविन्द का सपना साकार हुआ और लोहगढ़ की स्थापना हुई। सरहिंद पर कब्जा हुआ। खालसा को मूर्त रूप मिला। बहादुर शाह प्रथम और फिर फर्रुखसियार से युद्ध की आँख मिचौली चलती रही।

यद्यपि बंदा बहादुर वैरागी का शासनकाल बहुत छोटा था किन्तु उसने गुरुनानक देव और गुरुगोविन्द के नाम पर सिक्के चलवाए। किसानों और मजदूरों की दशा सुधारने के लिए जमींदारी उन्मूलन का सूत्रपात किया। सन् 1715 में बादशाह फर्रुखसियार की लाखों की फौज ने इस वीर को किसी भी हाल में पकड़ने का बीड़ा उठाया। एक विश्वासघाती के सहयोग से शाही सेना अब्दुल समद खाँ के नेतृत्व में गुरुदासपुर के गुरुदास नंगल गाँव को घेर ली। महीनों तक चले गोरिल्ला युद्ध के कारण रसद समाप्त हो गया और सैनिक भूखों मरने लगे। अन्तत: दिसम्बर 1715 को बंदा बहादुर वैरागी को गिरफ्तार कर लोहे के पिंजरे में बंद किया गया। भूखे- प्यासे गर्म सलाखों से बोटियाँ नोचते हुए हाथी पर लादकर शाही सेना पंजाब से दिल्ली की ओर कूच की।

दिल्ली की हार्डिंग लाइब्रेरी की भूमि देख चुकी है सैकड़ों सरदारों की कुर्बानी। 9 जून 1716 को वीर शहीद शिशु अजय सिंह की अद्वितीय कुर्बानी के पश्चात् मुगल हार मान चुके थे धर्मान्तरण कराने में। माँस विहीन बंदा बहादुर वैरागी को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया गया। जब-जब इतिहास मुगलकाल का पन्ना पलटेगा तब-तब बहादुर बंदा वैरागी के सपूत वीर अजय सिंह को कुतुबमीनार झुककर सलाम ठोकेगी और बंदा बहादुर सेतु गौरवशाली अतीत से वर्तमान को जोड़ेगा।

परिचय
नाम : अवधेश कुमार विक्रम शाह
साहित्यिक नाम : ‘अवध’
पिता का नाम : स्व० शिवकुमार सिंह
माता का नाम : श्रीमती अतरवासी देवी
स्थाई पता :  चन्दौली, उत्तर प्रदेश
 
जन्मतिथि : पन्द्रह जनवरी सन् उन्नीस सौ चौहत्तर
शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिन्दी व अर्थशास्त्र), बी. एड., बी. टेक (सिविल), पत्रकारिता व इलेक्ट्रीकल डिप्लोमा
व्यवसाय : सिविल इंजीनियर, मेघालय में
प्रसारण – ऑल इंडिया रेडियो द्वारा काव्य पाठ व परिचर्चा
दूरदर्शन गुवाहाटी द्वारा काव्यपाठ
अध्यक्ष (वाट्सएप्प ग्रुप): नूतन साहित्य कुंज, अवध – मगध साहित्य
प्रभारी : नारायणी साहि० अकादमी, मेघालय
सदस्य : पूर्वासा हिन्दी अकादमी
संपादन : साहित्य धरोहर, पर्यावरण, सावन के झूले, कुंज निनाद आदि
समीक्षा – दो दर्जन से अधिक पुस्तकें
भूमिका लेखन – तकरीबन एक दर्जन पुस्तकों की
साक्षात्कार – श्रीमती वाणी बरठाकुर विभा, श्रीमती पिंकी पारुथी, श्रीमती आभा दुबे एवं सुश्री शैल श्लेषा द्वारा
शोध परक लेख : पूर्वोत्तर में हिन्दी की बढ़ती लोकप्रियता
भारत की स्वाधीनता भ्रमजाल ही तो है
प्रकाशित साझा संग्रह : लुढ़कती लेखनी, कवियों की मधुशाला, नूर ए ग़ज़ल, सखी साहित्य, कुंज निनाद आदि
प्रकाशनाधीन साझा संग्रह : आधा दर्जन
सम्मान : विभिन्न साहित्य संस्थानों द्वारा प्राप्त
प्रकाशन : विविध पत्र – पत्रिकाओं में अनवरत जारी
सृजन विधा : गद्य व काव्य की समस्त प्रचलित विधायें
उद्देश्य : रामराज्य की स्थापना हेतु जन जागरण 
हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रति जन मानस में अनुराग व सम्मान जगाना
पूर्वोत्तर व दक्षिण भारत में हिन्दी को सम्पर्क भाषा से जन भाषा बनाना
 
तमस रात्रि को भेदकर, उगता है आदित्य |
सहित भाव जो भर सके, वही सत्य साहित्य ||
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डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ इन्दौर (म.प्र.) से खबर हलचल न्यूज के सम्पादक हैं, और पत्रकार होने के साथ-साथ शायर और स्तंभकार भी हैं। श्री जैन ने आंचलिक पत्रकारों पर ‘मेरे आंचलिक पत्रकार’ एवं साझा काव्य संग्रह ‘मातृभाषा एक युगमंच’ आदि पुस्तक भी लिखी है। अविचल ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज में स्त्री की पीड़ा, परिवेश का साहस और व्यवस्थाओं के खिलाफ तंज़ को बखूबी उकेरा है। इन्होंने आलेखों में ज़्यादातर पत्रकारिता का आधार आंचलिक पत्रकारिता को ही ज़्यादा लिखा है। यह मध्यप्रदेश के धार जिले की कुक्षी तहसील में पले-बढ़े और इंदौर को अपना कर्म क्षेत्र बनाया है। बेचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कम्प्यूटर साइंस) करने के बाद एमबीए और एम.जे.की डिग्री हासिल की एवं ‘भारतीय पत्रकारिता और वैश्विक चुनौतियों’ पर शोध किया है। कई पत्रकार संगठनों में राष्ट्रीय स्तर की ज़िम्मेदारियों से नवाज़े जा चुके अर्पण जैन ‘अविचल’ भारत के २१ राज्यों में अपनी टीम का संचालन कर रहे हैं। पत्रकारों के लिए बनाया गया भारत का पहला सोशल नेटवर्क और पत्रकारिता का विकीपीडिया (www.IndianReporters.com) भी जैन द्वारा ही संचालित किया जा रहा है।लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं।